श्रीरामचरितमानस: अहिल्या का उद्धार कैसे हुआ, पढ़ें जब विश्वामित्र ने भगवान राम के हाथों ताड़का को मार डाला।

श्री राम के बाण से मारे गए मृगों ने अपने शरीर को छोड़कर देवलोक को चले गए। आइए जानते हैं कि भगवान राम ने विश्वामित्र के कहने पर अहिल्या को बचाया और ताड़का को मार डाला।

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रामचरित्रमानस 

अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर की जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं। 22 जनवरी को भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होगी। रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर पूरा देश राममय हो रहा है। तुलसीदास ने अवधी में राम की कहानी इस खास अवसर पर पूरी तरह से बताई है। आज हम जानेंगे कि विश्वामित्र ने कैसे भगवान राम के हाथों ताड़का को मार डाला और फिर अहिल्या को बचाया।

श्री रामचन्द्रजी ने बालक्रीड़ा की और सभी को खुशी दी। कौशल्या जी उन्हें पालने में लिटाकर झुलाती या गोद में लेकर हिलाती-डुलातीं। प्रेम में डूबी हुई कौशल्या को रात और दिन का पता नहीं था। प्रेम में मग्न कौशल्या को दिन और रात का पता नहीं था। पुत्र के प्यार से माता उनके बचपन के चरित्रों को गाती थीं। राजा भोजन करने के लिए बुलाते हैं, तो वे अपने परिवार से बाहर नहीं जाते। जब कौशल्या जी को बुलाया जाता है, तो भगवान ठुमुक-ठुमुक भाग जाते हैं। जिनका वेद ‘नेति’ कहकर निरूपण करते हैं और शिवजी ने जिनका अंत नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़ने के लिए दौड़ती हैं। राजा ने धूल से ढके हुए उन्हें गोद में बैठा लिया, हंसते हुए।

भोजन करते हुए भी मन व्यस्त है। जब उन्हें अवसर मिल गया, वे मुंह में दही-भात लपटाकर किलकारी मारते हुए चारों ओर भाग निकले। सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदों ने श्री रामचन्द्र जी की बहुत ही सरल (भोली) और सुंदर (मनभावनी) बाललीलाओं का गान किया है। विधाता ने उन लोगों को वंचित कर दिया जो इन लीलाओं में मन नहीं लगाया। तीनों भाईयों का यज्ञोपवीत संस्कार गुरु, पिता और माता ने किया जब वे बालक बने। श्री रघुनाथ जी (उनके भाई भी) गुरु के घर में पढ़ने गए और थोड़े ही समय में सब कुछ सीख गए। यह बड़ा कौतुक (अचरज) है कि चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान पढ़ें।

राम के बाण से मरने वाले मृग

चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शील में बहुत अच्छे हैं और सब राजाओं की लीलाओं में मग्न हैं। हाथों में धनुष और बाण बहुत सुंदर लगते हैं। चराचर (जड़-चेतन) रूप देखकर मोहित हो जाते हैं। जिन गलियों में वे सभी भाई खेलते हुए निकलते हैं, सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेह से शिथिल हो जाते हैं या ठिठक जाते हैं। कोसलपुर में रहने वाले सभी लोग कृपालु श्रीरामचन्द्रजी को प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी हर दिन वन में शिकार करते हैं और भाइयों और इष्टमित्रों को साथ लेते हैं। मृगों को मारने को मन में शुद्ध मानते हैंहर दिन लाकर राजा (दशरथ) को दिखाते हैं।

श्री राम के बाण से मारे गए मृगों ने अपने शरीर को छोड़कर देवलोक को चले गए। श्री रामचन्द्र जी अपने छोटे भाइयों और सखाओं के साथ खाते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं। कृपानिधान श्री रामचन्द्र जी नगर के लोगों को सुखी करते हैं। वे ध्यान लगाकर पुराण सुनते हैं और फिर अपने छोटे भाइयों को बताकर बताते हैं। प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हुए श्री रघुनाथ जी नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र को देखकर राजा बहुत खुश होते हैं। जो व्यापक, अकल (निरवयव), अजन्मा, निर्गुण हैं; तथा जिनकेजैसे नाम नहीं रूप, भगवान अपने अनुयायों के लिए अलौकिक चरित्र प्रदान करते हैं।

विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को लेने के लिए दशरथ के दरवाजे पर प्रवेश किया

ज्ञानी महामुनि विश्वामित्र ने वन में एक शुभ स्थान (पवित्र स्थान) का पता लगाकर बस गए। उस स्थान पर जहां मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, वे मारीच और सुबाहु से बहुत भयभीत थे। राक्षस यज्ञ देखते ही भाग निकलते थे और हिंसा फैलाते थे, जिससे मुनि बहुत दुखी होते थे। गांधी के पुत्र विश्वामित्र जी को चिंता हुई कि ये पापी राक्षस भगवान को मारने के बिना नहीं मरेंगे। तब सर्वश्रेष्ठ मुनि ने सोचा कि भगवान ने पृथ्वी का बोझ उठाने के लिए आया है।

इसलिए मैं जाकर उनके चरणों का दर्शन करूं और उनसे विनती करके दोनों भाइयों को लाऊँगा। जो ज्ञान, वैराग्य और सभी गुणों के मूल हैं, मैं अपनी आँखें भरकर उन देवताओं को देखूँगा। बहुत मनोरथ से जाने में देर नहीं लगी। वे सरयू के जल में स्नान करके राजा के दरवाजे पर आए। जब राजा ने मुनि का आना सुना, तो ब्राह्मणों का समूह राजा के पास आया और मुनि को दंडवत करके लाकर अपने आसन पर बैठाया। चरणों को धोकर, उन्होंने कहा कि आज कोई भी मेरे समान धन्य नहीं है। फिर बहुत से भोजन दिए, जिससे श्रेष्ठ मुनि बहुत खुश हुआ। फिर राजा ने अपने चारों पुत्रों को मुनि के सामने खड़ा कर दिया।

श्री रामचन्द्र को देखकर मुनि अपना शरीर भूल गए। श्री राम जी के मुख की सुंदरता देखकर वे ऐसे मग्न हो गए, मानो चकोर पूरे चन्द्रमा को देखकर प्रसन्न हो जाए। तब खुश होकर राजा ने मुनि से कहा कि उससे पहले कभी ऐसी कृपा नहीं की थी। आज आपका शुभागमन क्यों हुआ? मैं उसे समाप्त करने में देर नहीं लगाऊंगा। मुनि ने विनती की, हे राजन्! मुझे राक्षसों का समूह बहुत सताता है। मैं इसलिए आपसे कुछ मांगने आया हूँ। श्री रघुनाथ जी, मेरे छोटे भाई के साथ। राक्षसों को मार डालने पर मैं सुरक्षित हो जाऊंगा, या सनाथ हो जाऊंगा।

सब सुत मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहीं बनेंगे गोसाईं।।

निसिचर बहुत बुरा है। मैं सुंदर सुत परम किसोरा कहूँगा।।

हे राजन! इनको खुशी से दो, मोह और अज्ञान को छोड़ दो। हे स्वामी! इससे आपको धर्म, सुयश और परम कल्याण मिलेगा। राजा का हृदय कांप उठा और उनकी शांति फीकी पड़ गई जब उन्होंने इस बहुत अप्रिय वाणी को सुना। हाय ब्राह्मण! आपने सोच-समझकर कहा कि मैं चौथे वर्ष में चार पुत्रों को जन्म दिया। हे मुनि! आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना मांग लीजिए; मैं आज खुशी से अपना सब कुछ दे दूंगा। प्राण और देह से प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं भी उसे एक क्षण में दे दूंगा। मुझे हर पुत्र प्राणों से प्यारा है; उनमें भी, हे देव! राम जी इसलिए [किसी प्रकार से] देना असंभव है। यहाँ अत्यन्त भयानक और क्रूर राक्षस हैं, और वहाँ पूरी तरह से युवा है। ज्ञानी मुनि विश्वामित्र जी ने राजा की प्रेमपूर्ण वाणी सुनकर बहुत प्रसन्न हो गए।

तब वसिष्ठ जी ने राजा को बहुत समझाया, जिससे उसका शक दूर हो गया। राजा ने दोनों पुत्रों को बहुत आदर से बुलाया और दिल से उन्हें बहुत कुछ सिखाया। फिर उन्होंने कहा, “हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे जीवन हैं।” अब आप ही इनके पिता हैं, हे मुनि! दूसरा कोई नहीं। राजा ने बहुत आशीर्वाद देकर अपने पुत्रों को ऋषि को सौंप दिया। फिर भगवान माता के महल में गए और उनके चरणों में सिर नवाकर चले।

राम को विश् वामित्र ने ताड़का मार डाला

सिंहरूपी दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) मुनि का भय हरने के लिए खुश होकर चले। वे भी कृपा के समुद्र, धीरबुद्धि के समुद्र और पूरे विश्व के कारण हैं। भगवान के लाल नेत्र, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर, पीताम्बर पहने हुए कमर और सुंदर तरकश। दोनों हाथों में खूबसूरत बाण और धनुष हैं। गौरवर्ण और श्याम दोनों बहुत सुंदर हैं। विश्वामित्र जी को बहुत बड़ी संपत्ति मिली। वे सोचने लगे कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव हैं, जो ब्राह्मणों के भक्त हैं। भगवान ने अपने पिता को भी मेरे लिए छोड़ दिया।

रास्ते में मुनि ने ताड़का दिखाया। शब्द सुनते ही वह क्रोधित होकर भाग निकली। श्री राम ने एक ही बाण से उसे मार डाला और उसे दीन जानकर अपना दिव्य स्वरूप निजपद दिया। तब ऋषि विश्वामित्र ने प्रभु को मन में विद्या का भंडार समझते हुए भी ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीर में अतुलनीय बल और तेज का प्रकाश हो। मुनि प्रभु श्री राम को अपने आश्रम में ले आए और उन्हें अपना सर्वोच्च हितैषी मानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फल खाया। पहले श्री रघुनाथ ने मुनि से कहा कि वह जाकर निडर होकर यज्ञ करेगा। यह सुनते ही सभी मुनि हवन करने लगे श्री राम ने यज्ञ की देखभाल की।

चले जाते हुए मुनि दीन्ही को देखा। ताड़का सुनि क्रोध करि धाई।।
वान प्रान हरि लीन्हा। तू जानि तेहि पद दीन्हा।।

अहिल्या को भगवान राम ने बचाया

मुनियों का शत्रु, क्रूर राक्षस मारीच, यह सुनकर अपने साथियों को लेकर भाग निकला। वह सौ योजन लंबे समुद्र के पार जा गिरा, जब श्री राम ने उसे बिना फलों का बाण मारा। फिर सुबाहु को गोली मार दी। यहाँ छोटे भाई लक्ष्मण ने राक्षसों की सेना को हराया। इस तरह श्री राम ने राक्षसों को मार डाला और ब्राह्मणों को शांत कर दिया। उस समय सभी देवता और मुनि हर्षोल्लास करने लगे। श्री रघुनाथ जी ने वहां कुछ दिन और बिताए और ब्राह्मणों की सेवा की। भक्ति के कारण ब्राह्मणों ने उन्हें पुराणों की कई कहानियां बताईं, जबकि प्रभु सब कुछ जानते थे। तब मुनि ने विनम्रतापूर्वक समझाकर कहा, “हे प्रभु! चलकर एक चरित्र देखो।” धनुषयज्ञ की खबर सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र जी प्रसन्न होकर चले।

रास्ते में एक आश्रम दिखाई दिया। वहाँ कोई जानवर नहीं था। प्रभु ने पत्थर की शिला देखकर पूछा, तो मुनि ने पूरी कहानी बताई। अहिल्या, गौतम मुनि की पत्नी, शापवश पत्थर की देह धारण करके बड़े धीरज से आपके चरणकमलों की धूलि चाहती है। रघुवीर, इस पर कृपा कीजिए। वह तपोमूर्ति अहल्या वास्तव में श्रीरामजी के पवित्र और दुःख को दूर करने वाले चरणों से मिली। वह भक्तों को खुशी देने वाले श्री रघुनाथ जी को देखकर सामने खड़ी रह गई। वह बहुत प्रेम से अधीर हो गई। उसके शरीर को पीड़ा हुई मुख से कुछ नहीं कहते थे। वह बहुत बड़ी अहिल्या प्रभु के चरणों पर गिर पड़ी और उसके दोनों नेत्रों से प्रेम और खुशी के आंसू बहने लगे।

फिर उसने शांत होकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथ की कृपा से भक्ति की। उसने फिर बहुत निर्मल स्वर से कहा, “हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथ जी! आपकी जय हो!” हे भगवान, मैं एक अपवित्र स्त्री हूँ! आप जगत को शुद्ध करने वाले, अपने अनुयायियों को खुशी देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन, विश्व को जन्म-मृत्यु के भय से बचाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, कृपया मुझे बचाओ।

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी॥
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
ऐसे ही गौतम स्त्री बार-बार हरि चरन परी॥
जो बहुत मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक खुश हो गया॥

मुनि ने मुझे शाप देकर बहुत अच्छा किया। मैं उसे बहुत अनुग्रह मानती हूँ कि मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्रीहरि (आप) को देखा। शंकरजी आपके दर्शन को सबसे बड़ा लाभ मानते हैं। परमेश्वर, मेरी विनती है कि मैं बहुत बुद्धिमान हूँ। हे नाथ! मैं सिर्फ यही चाहती हूँ कि मेरा मनरूपी भौंरा आपके चरणकमल की रज के प्रेमरूपी रस को हर समय पीता रहे। कृपालु हरि (आप) ने मेरे सिर पर जिन चरणों से परम पवित्र नदी गंगा प्रकट हुई, जिन्हें शिव ने सिर पर रखा और ब्रह्मा ने उन चरणों को पूजा जाता है। उस वर को पाकर गौतम की पत्नी अहिल्या खुशी से पतिलोक चली गई।

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