प्रधानमंत्री मोदी ने कालाराम मंदिर में लगाया पोंछा, उसी मंदिर से भीमराव अम्बेडकर ने सत्याग्रह चलाया था।

काला राम मन्दिर में प्रवेश का आंदोलन

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शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नासिक के प्रसिद्ध कालाराम मंदिर में पूजा-अर्चना की और झांझ-मजीरे बजाए। प्रधानमंत्री मोदी ने 22 जनवरी को भव्य राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से 10 दिन पहले यह दौरा किया था। कालाराम मंदिर का इतिहास भगवान श्रीराम, दलित उत्थान और बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर से जुड़ा है।

खबर में अधिक पढ़ें..।

  • कालाराम मंदिर का इतिहास क्या है?
  • कालाराम मंदिर में प्रवेश की मांग
  • कालाराम मंदिर की धार्मिक भूमिका

प्रधानमंत्री मोदी ने कालाराम मंदिर में पोंछा लगाकर मंदिरों में साफ-सफाई की अपील की। इस मंदिर में भगवान श्रीराम ने वनवास किया था और 1930 में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने दलितों को मंदिर में प्रवेश देने का बड़ा अभियान शुरू किया था। डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के नेतृत्व में कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन ने भारत में जातिविरोधी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

कालाराम मंदिर में प्रवेश की मांग

इस समय भारत में निचली जाति के लोगों को अछूत माना जाता था। मंदिर में भी उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया था। सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से निचली जाति के लोगों को उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ा। निचली जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने की दो बड़ी कोशिशें 1928 में अमरावती में और 1929 में पुणे में की गईं। फरवरी 1929 में अंबादेवी मंदिर प्रवेश आंदोलन अमरावती में शुरू हुआ, लेकिन बहुत समर्थन नहीं पा सका। अक्टूबर 1929 में पुणे में पार्वती मंदिर पर एक और प्रयास हुआ, जो 1930 तक जारी रहा।

2 मार्च, 1930 का दिन

2 मार्च 1930 को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन की शुरुआत की, जो भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन था। उस समय करीब 15,000 लोगों ने अम्बेडकर की आवाज सुनाई। इनमें बहुत सी औरतें भी थीं। स्थिति को देखते हुए बॉम्बे सरकार ने धारा 144 लागू की थी। अम्बेडकर के अनुरोध पर सत्याग्रही शांतिपूर्ण रहे, हालांकि पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया। भाऊराव गायकवाड़, पतितपवनदास, अमृतराव रणखंबे और पी.एन. राजभोज ने अम्बेडकर के साथ इस सत्याग्रह में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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